कुछ सीखने सिखाने में, थोड़ी खोने और पाने में
कभी पाना क्या है उसकी जुगत लगाने में
कभी झूट के ढेर में से सच को बाहर लाने में
कभी खुद से ही उस सच को झुटलाने में
ज़िंदगी आधी बीत गयी पल पल का गणित लगाने में
बेमतलब की बातों पे यूँ ही रूठ जाने में
कभी रूठे हुए को मानने में
अपनों की हर छोटी बड़ी ग़लतियाँ दिखा कर दिल दुखाने में
और गैरों के सामने मुस्कुराहट छुपा कर उनका दिल बहलाने में
ज़िंदगी आधी बीत गयी इन रिश्तों के ताने बाने में
आज किस्मत में नहीं है, सही वक़्त आएगा
और जब वो वक़्त आएगा तब देखा जाएगा
इन झूठ मूठ की बातों से अपनी कमज़ोरी छुपाने में
कमज़ोरों की भीड़ में खुद को शेर बताने में
ज़िंदगी आधी बीत गयी खुद से खुद को छुपाने में
कुछ आधी बची है जो उम्मीदों से भारी है
आँखों में सपने तो हैं पर अतीत की चादर ओदे सोई पड़ी है
बहुत कुछ है ज़हन में, कुछ ज़रूरतें और कुछ ईच्छायें हैं पाने की
आधी तो बिना सोचे समझे ना जाने कब बीत गयी
यूँ ही बीत ना जाए बाकी की, इच्छा है ज़िंदगी जी जाने की
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